झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में बताइए क्या और कैसे?

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Virendra sahu asked 4 months ago

रानी लक्ष्मी बाई का जन्म कब और कहां हुआ? रानी लक्ष्मीबाई के पिता कौन थे? रानी लक्ष्मीबाई ने कौन सी लड़ाई लड़ी? उनके पुत्र का नाम क्या था? रानी लक्ष्मीबाई ने क्या-क्या संघर्ष किए आदि विवरण बताएं,

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Virendra sahu answered 4 months ago

रानी लक्ष्मीबाई प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की महान सेनापति थीं। इनका बचपन का नाम मनुबाई था। इनका जन्म 19 नवंबर, 1835 ई० को वाराणसी में हुआ था। झाँसी के राजा गंगाधर राव के साथ विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा। लक्ष्मीबाई के पिता ब्राह्मण थे। उनकी माँ बहादुर एवं धार्मिक थीं। रानी की माँ उन्हें मात्र 4 वर्ष की आयु में ही छोड़कर स्वर्ग सिधार गई थीं।

रानी लक्ष्मीबाई बचपन

रानी लक्ष्मीबाई ने बचपन में ही घुड़सवारी, तलवार और बंदूक चलाना सीख लिया था। विवाह के पश्चात् सन् 1851 में रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, परंतु दुर्भाग्यवश वह मर गया। उस समय उसकी उम्र मात्र 4 महीने थी। फिर रानी ने एक पुत्र गोद लिया।

उन्होंने उस दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा। परंतु अंग्रेज़ों को यह अच्छा नहीं लगा कि रानी लक्ष्मीबाई का दत्तक पुत्र दामोदर राव उनके सिंहासन का कानूनी वारिस बने। क्योंकि झाँसी पर अंग्रेज़ स्वयं शासन करना चाहते थे।

इसलिए अंग्रेज़ों ने कहा कि झाँसी पर से रानी लक्ष्मीबाई का अधिकार खत्म हो जाएगा, क्योंकि उनके पति महाराजा गंगाधर का कोई उत्तराधिकारी नहीं है। और फिर अंग्रेजों ने झाँसी को अपने राज्य में मिलाने की घोषण कर दी। इसी बात पर अंग्रेज़ और झाँसीवासियों के बीच युद्ध छिड़ गया।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

रानी लक्ष्मीबाई झाँसी छोड़ने को तैयार नहीं थीं। वह देशभक्ति और आत्म-सम्मान की प्रतीक थीं। इसी बीच सन् 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो गया। रानी लक्ष्मीबाई युद्ध-विद्या में पारंगत थीं। वह पूरे शहर को स्वयं देख रही थीं। रानी ने पुरुषों का लिबास पहना हुआ था।

बच्चा उनकी पीठ पर बंधा हुआ था। रानी ने घोड़े की लगाम मुँह से पकड़ी हुई थी और उनके दोनों हाथों में तलवारें थीं। अत: उन्होंने अंग्रेजों के समक्ष आत्म-समर्पण नहीं किया और अंग्रेज़ों का डटकर मुकाबला किया।

अन्य राजाओं ने उनका साथ नहीं दिया। इस कारण वे हार गईं और उन्होंने झाँसी पर अंग्रेजों का कब्जा हो जाने दिया। इसके बाद काल्पी जाकर उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। नाना साहब और तांत्या टोपे के साथ मिलकर रानी ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए।

महारानी लक्ष्मीबाई शहीद

महारानी लक्ष्मीबाई घुडसवार की पोशाक में लड़ते-लड़ते 17 जून, 1858 को शहीद हो गईं। यदि जिवाजी राव सिंधिया ने रानी लक्ष्मीबाई से छल न किया होता तो भारत 100 वर्ष पहले 1857 में ही अंग्रेजों के आधिपत्य से स्वतंत्र हो गया होता। हर भारतीय को उनकी वीरता सदैव स्मरण रहेगी।

कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने उनकी वीरता के बारे में बहुत कुछ लिखा है –

“बुंदेले हर बोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।”

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